पाथल और पीथल (हिन्दी काव्यानुवाद) – कन्हैयालाल सेठिया

Pithal And Pathal - Kanhaiyalal Sethia - Mera Rajasthan

(पाथल- महाराणा प्रताप,  पीथल- पृथ्वीराज राठौड़*

:अकबर के नवरत्नों में से एक)

 

अरे! घास की रोटी भी, जब वन-बिलाव लेकर भागा,

नन्हा अमरसिंह चीख पड़ा, राणा का सोया दुःख जागा।

 

मैं लड़ा बहुत और सहा बहुत, मेवाड़ी मान बचाने को,

पीछे ना रण में हटा कभी, दुश्मन को धूल चटाने को।

 

जब याद करूं हल्दीघाटी, आंखों में खून उतर आता,

सुख और दुःख का साथी चेतक, सोयी-सी टीस जगा जाता।

 

पर आज देखता हूं रोता, जब राजकुंवर को रोटी को,

क्षत्रिय-धर्म को भूलूं मैं, भूलूं भारत की चोटी को।

 

महलों में छप्पन भोज जिन्हें, मनुहार बिना नहीं करते थे,

थाली सोने की, नीलम की- चौकी के बिना न धरते थे।

 

जिन नन्हें-नन्हें पैरों को, मिलते थे फूलों के बिस्तर,

वो भूख-प्यास से कुम्हलाए, है सूर्यवंश के राजकुंवर।

 

ये सोच वज्र-सी भीमकाय, दो हिस्सों में टूटी छाती,

आंसू भरकर राणा बोला- मैं लिक्खू अकबर को पाती।

 

पर एक विकराल भूत की-सी, चित्तौड़ खड़ा लेकर छाया,

जब दिखा हृदय अरावल का, राणा पाती ना लिख पाया।

 

झुक जाऊं कैसे आन मुझे, कुल के केसरिया बाने की,

कैसे बुझ जाऊं जलती लौ मैं, आजादी के परवाने की।

 

पर अमरसिंह की सिसकी सुन, राणा का हृदय उमड़ आया,

”सम्राट तुम्हें मैंने माना” दिल्ली संदेशा भिजवाया।

 

राणा के खत को पढ़ा गया, अकबर का सपना सांच हुआ,

जब बार-बार भी पढ़ा गया, आँखों पर ना विश्वास हुआ।

 

कि आज हिमालय पिघल रहा, कि आज हुआ सूरज शीतल,

कि आज शेष का सिर डोला, ये सोच हुआ सम्राट विकल।

 

फिर एक इशारे से भागा, पीथल को दूत बुलाने को,

किरणों-सा पीथल आ पहुंचा, यह सच्चा भरम मिटाने को।

 

उस वीर साहसी पीथल को, रजपूती गौरव भारी था,

क्षत्रिय-धर्म का नेमी वो, राणा का प्रेम-पुजारी था।

 

दुश्मन के मन का कांटा था, था बीकानेरी वो सपूत,

राठौड़ युद्ध में तेज बहुत, था चला दुधारी लेता लूट।

 

यह बात जानता था अकबर, घावों पर नमक लगाने को,

पीथल को तभी बुला भेजा, राणा की हार पढ़ाने को।

 

सुन पीथल मैंने बांध लिया, पिंजरे में जंगली शेर पकड़,

यह देख लिख दिया खत उसने, किस भांति फिरेगा अब तू अकड़।

 

भर चुल्लू पानी में डूब मर, तू झूठे गाल बजाता था,

ले राणा का प्रण टूट गया, तू भाट बना इतराता था।

 

मैं आज बादशाह धरती का, मेवाड़ी शान पगों में है,

अब बता किसी रजवाड़े के, रजपूती खून रगों में है?

 

जब पीथल ने पाती देखी, और देखी राणा की मुहर,

पैरों से धरती खिसक गई, आंखों में आया पानी भर।

 

पर फिर बोला तत्काल संभल, यह बात निरी ही झूठी है,

राणा की शान सदा ऊंची, राणा की आन अटूटी है।

 

जो हो आदेश तो लिख पूछूं, राणा को पाती के खातिर,

ले पूछ भले ही पीथल तू, यह बात सही बोला अकबर।

 

है आज सुना मैंने वनराज, सियारों के संग सोएगा,

है आज सुना मैंने सूरज, बादल के पीछे खोएगा।

 

है आज सुना मैंने चातक, धरती का पानी पी लेगा,

है आज सुना मैंने हाथी, कुत्तों की भांति जी लेगा।

 

है आज सुना मैंने सुहाग के होते, विधवा होगी रजपूतण,

तलवार म्यान में सोएगी, चाहे ललकारे भीषण रण।

 

है मेरा हृदय कांप रहा, मूछों की मोड़-मरोड़ गई,

पीथल लिख पूछा राणा से, यह बात कहां तक बता सही।

 

कागज पढ़ते ही राणा की, आंखों में आया खून उतर,

मारी दहाड़ सिंह की-सी, धिक्कार मुझे मैं हूँ कायर।

 

मैं मर जाऊं भूखा-प्यासा, पर मेवाड़ धरा आजाद रहे,

मैं घोर उजाड़ों में भटकूँ, पर मन में मां की याद रहे।

 

मैं रजपूतण का जाया हूं, रजपूती कर्ज चुकाऊंगा,

कट जाए पर सिर पर झुके नहीं, दिल्ली का शीश झुकाऊंगा।

 

पीथल क्या हिम्मत बादल की, जो सूरज की किरणें रोके,

सियारों को वह कोख नहीं, जो सिंहों संग देखे सोके।

 

धरती का पानी पी ले ऐसी, चातक की चोंच बनी नहीं,

हाथी बन जी ले श्वान कभी, यह बात अभी तक सुनी नहीं।

 

जब तक हाथों में खड्ग कौन, विधवा कहता रजपूतण को,

सीने में सोयी तलवारें, दुश्मन के देखेंगी रण को।

 

मेवाड़ धधकता अंगारा, आंधी में चमचम चमकेगा,

अब विजयगान हर एक सुर में, पग-पग पर धमधम धमकेगा।

 

तू रख मूंछें ऐंठें अपनी, अब खूनी नदी बहा दूंगा,

अकबर से लड़कर अंत तक, उजड़ा मैवाड़ बसा दूंगा।

 

जब राणा का संदेश गया, पीथल की छाती दूनी थी,

सूरज भारत का चमक रहा, अकबर की दुनियाँ सूनी थी।

 

कन्हैयालाल सेठिया

 

शब्दार्थ:

पातस्या – बादशाह

पाग पगां में – पगड़ी पैरों में

सागी सैनांणी – श्रेष्ठ राजचिन्ह

नाहरियो – शेर

स्याला – सियार

सागै सोवैलो – साथ सोता है

आटां खोवैलो – पीछे खो गया है

आखर – अक्षर

खिमता – क्षमता

सूर उगाली – सूर्य का आग बरसना

हाथल – थप्पड़

वा कूंख मिली कद स्याली ने – ऐसी कोख सियारनी को कब मिली

 

कवि परिचय:

राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध कवि है। जन्म राजस्थान के चूरु जिले के सुजानगढ़ शहर में हुआ। व्यापारिक घराने से होने के बावजूद श्री सेठिया ने कभी भी साहित्य के साथ समझौता नहीं किया। पद्मश्री (2004) सेठिया जी को लीलटांस राजस्थानी कविता संग्रह पर साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का पुरस्कार प्रदान किया गया तथा वर्ष 1988 में ज्ञानपीठ के मूर्तिदेवी साहित्य पुरास्कार से भी सम्मानित किया गया। आ तो सुरगा नै सरमावै, ई पै देव रमन नै आवे ………. धरती धोराँ री हो अथवा अरे घास री रोटी ही जद बन बिलावडो ले भाग्यो….जैसी अनेक रचनाएं अति लोकप्रिय और सर्वविदित अमर रचनाएं हैं। राजस्थान में सामंतवाद के ख़िलाफ़ आपने जबरदस्त मुहिम चलायी और पिछडे वर्ग को आगे लाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारत छोडो आन्दोलन के समय आप कराची में थे। 1943 में सेठिया जी जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया के संपर्क में आए।

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