चाणक्य – सम्पूर्ण कहानी भाग – 10

Complete Chanakya Story Biography

सुरक्षा व्यवस्था की जांच

चाणक्य ने सुरक्षा-अधिकारी तथा कुछ सैनिको को साथ लिया, फिर वे स्वयं पूरे महल की जांच करने लगे।

 

“क्षमा करे देव !” तभी मुख्य सुरक्षा-अधिकारी बोला___”क्या आपको हम पर विश्वास नहीं है जो आप स्वयं जांच करना चाहते है ?”

 

“तुम्हें नहीं सोचना चाहिए।” चाणक्य बोले___”मैं तुम पर पूरा-पूरा विश्वास करता हूं, परन्तु मैने एक ऐसी चीज देखी जो मुझे संदेह करने पर विवश करती है।”

 

“किस पर संदेह करने पर विवश करती है आचार्य ?”

 

“सुरक्षा व्यवस्था पर। मैं तुम्हे दोषी नहीं कह रहा हूं। मैं तो केवल यह कहना चाहता हूं कि जो मुझे दिखाई दिया है, वह तुम नहीं देख पाए।”

 

“मैं क्या नहीं देख पाया देव ?”

 

मुख्य सुरक्षा-अधिकारी ने चौंककर उस ओर देखा, जिस ओर चाणक्य ने संकेत किया था।

 

“हां गुरुदेव।” वह बोला___”मुझे कुछ चींटिया दिखाई दे रही है।”

 

“शाबाश।” चाणक्य बोले___”अब यह सोचो कि ये चींटिया हमे क्या बताती है ?”

 

“क्या बताती है गुरुदेव ?”

 

“यह पुरा महल संगमरमर का बना हुआ है।” चाणक्य बोले___”सम्पूर्ण महल पूर्ण रूप से स्वच्छ है। चमचमा रहा है। यहां पर चींटियों का होना तुम्हे आश्चर्य में नहीं डालता ?”

 

मुख्य सुरक्षा-अधिकारी का माथा ठनका। वह मन-ही-मन अपने आप को इस बात के लिए कोसने लगा कि इतनी छोटी-सी-बात उसकी समझ में क्यों नहीं आई ?

 

“मेरे साथ आओ।” कहकर चाणक्य आगे बड़े तथा ध्यानपूर्वक यह देखने लगे की वे चींटिया कहां से आ रही है और कहां जा रही है। कुछ ही समय बाद उन्हें पता चल गया कि महल के फर्श के नीचे एक गुप्त मार्ग है। वहां कुछ खाने-पीने की वस्तुएं है।

 

यह विचार मन में आते ही उन्होंने सुरक्षा-कर्मियों को आदेश दिया कि वे केरोसिन लेकर आएं। बाद में उन्होंने गुप्त मार्ग को खुलवाया। उसमे कई टन केरोसिन डलवाया तथा आग लगवा दी। नीचे छिपे सैनिकों के हा-हाकार के स्वर गूंजने लगे। फिर उन्होंने युद्ध में विजय प्राप्त करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी की और चंद्रगुप्त को सम्राट घोषित कर दिया।

 

अंतिम निर्णय

अगले दिन चारों ओर हा-हाकार मचा हुआ था। उस हा-हाकार का कारण था चाणक्य का अंतिम निर्णय। वे अपने शेष जीवन को सत्य व शान्ति की खोज में बिताना चाहते थे। जब चन्द्रगुप्त के कानों तक यह बात पहुंची तो उन्हें तनिक भी विश्वास न हुआ। वे दौड़े-दौड़े अपने गुरु के पास जा पहुंचे और उनके चरण पकड़कर बोले___”गुरुदेव ! यह मैं क्या सुन रहा हूं ? क्या आप हमे छोड़कर कहीं चले जाना चाहते है ?”

 

“तुमने ठीक सुना है चन्द्रगुप्त।” चाणक्य बोले___”लक्ष्य तक पहुंचने के बाद पथिक विश्राम चाहता है। शांति चाहता है। चाणक्य के लिए यदि कहीं शान्ति है तो वह शून्य की गोद में है। चाणक्य ने कभी जीवन में सुख नहीं देखा। दुःख ही उसके जीवन की उपलब्धि है। अब वह सुख चाहता है। संसार में उसे सुख नहीं मिल सकता।”

 

“यदि आपकी यही इच्छा है तो चन्द्रगुप्त भी आपके साथ चलेगा। चंद्रगुप्त अपने गुरु के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता।”

 

“नहीं। यह अब सम्भव नहीं। तुम अब इतने कमजोर नहीं जो मेरी उंगली पकड़कर चलो।”

 

“आपके बिना मैं कुछ नहीं कर पाउंगा गुरुदेव ! नहीं चाहिए मुझे भारत का चक्रवर्ती सम्राज्य ! यदि आप चाहते है कि मैं सम्राट बनूं तो आपको सदा मेरे पास रहकर मेरा मार्गदर्शन करना होगा। आपके बिना मैं एक क्षण भी नहीं रहूंगा।”

 

“इस प्रकार की अधीरता दिखाकर मेरी तपस्या भंग न करो चंद्रगुप्त। मैने तुम्हे वीरता की शिक्षा दी है। कायरता की नहीं। मैं तुम्हारी कीर्ति चारों दिशाओं में लिखी हुई देखना चाहता हूं। धरती और आकाश को तुम्हारी महानता के गीत गाते हुए देखना चाहता हूं।”

 

“मैं आपके प्रत्येक स्वप्न को पूरा करूंगा गुरुदेव, परन्तु आप मुझे छोड़कर जाने की बात मत करे।”

 

“माता-पिता और गुरुजन जीवन में सदा साथ नहीं रह सकते चंद्रगुप्त। उनका वियोग सभी को सहना ही पड़ता है। सच्चे मनुष्य वही होते है जो निरंतर अपने पथ पर अग्रसर रहते है। तुमने मेरी तपस्या को पूरी करने में सदा मेरी सहायता की है, परन्तु मुझे अभी तक इस तपस्या का पूरा फल नहीं मिला। क्या तुम नहीं चाहते कि तुम्हारे गुरु को उसकी तपस्या का पूरा फल न मिले ?”

 

“मैं ऐसा क्यों नहीं चाहूंगा गुरुदेव ?”

 

“तो फिर, मेरी ओर ध्यान देना बंद करो। इस देश की प्रजा आशापूर्ण दृष्टी से तुम्हारी ओर देख रही है। उनकी आशाओं को पूरा करने में जुट जाओ। जो निराश्रित है, उन्हें आश्रय दो। जो भूखे है, उन्हें रोटी दो। जो बेकार है, उन्हें काम दो। जो दुःखी है, उन्हें सुख दो। जब मेरे देश की प्रजा सुखी हो जाएगी, समझ लेना तुम्हारे गुरु को उसकी तपस्या का पूरा फल मिल गया।”

 

“परन्तु गुरुदेव, आपके बिना मैं यह सब कैसे कर पाउंगा ?”

 

“कर पाओगे। मैं इस बात को अच्छी तरह से जानता हूं। आखिर गुरु हूं तुम्हारा। तुम्हारी रग-रग को पहचानता हूं। तुम मेरे तप को व्यर्थ नहीं जाने दोगे। मुझे पूरा विश्वास है।”

 

“परन्तु गुरुदेव…।”

 

“अभी भी किंतु-परंतु कर रहे हो ?” चाणक्य कठोर स्वर में बोले___”क्या तुम्हे लज्जा नहीं आती ? उठो यहां से और जाकर अपना कार्य करो। यह मेरी आज्ञा है।”

 

चन्द्रगुप्त ने गुरु के चरण छोड़ दिए, फिर रोते-बिलखते वहां से लौट गए।

 

चन्द्रगुप्त अभी गए ही थे कि वहां राक्षस आ पहुंचा। उसके नेत्र आंसुओ से भरे हुए थे। चाणक्य उसका कन्धा थपथपाकर बोले___”क्या तुम भी मेरे जाने से दुखी हो ?”

 

“आपके जाने का समाचार पाकर कौन दुखी न होगा।” राक्षस बोला___”मेरी समझ में नहीं आ रहा कि आप ऐसा क्यों कर रहे है ? इस देश को किसके सहारे छोड़ जाना चाहते है ?”

 

“महामात्य राक्षस के सहारे।” चाणक्य बोले___”राक्षस के रहते इस देश की आन, बान और शान को कोई खतरा नहीं।”

 

“आपने मुझे सब कुछ देकर भी मेरा सब कुछ छीन लिया है गुरुश्रेष्ठ। मैं नहीं जानता था कि आपके ह्रदय में दया और त्याग का कोष छिपा हुआ है। यदि पहले पता होता तो आपसे कभी वैर न रखता। अब पता चला है तो आप मुझे छोड़ जाना चाहता है। अपने चरणो में मुझ कठोर ह्रदय को स्थान नहीं देना चाहते।”

 

“तुम्हारा स्थान मेरे ह्रदय में राक्षस ! यह सत्य है कि तुमने पहले मुझे नहीं जाना, परंतु यह भी सत्य है कि मैने तुम्हे जानने में कभी भूल नहीं की। विरोधी होते हुए भी मैने तुम्हारा सम्मान किया। आज भी मैं तुम्हारा सम्मान करता हूं और सदा करता रहूंगा।”

 

अश्रुपूर्ण विदाई

चाणक्य ने अपने सभी अधिकार त्याग दिए। वे सभी को रोता-बिलखता छोड़कर वन में चले गए। इसके बाद उन्हें कभी किसी ने नहीं देखा। उन्होंने कब इस नश्वर संसार को छोड़ा, कोई नहीं जानता। कोई नहीं जानता कि उन्होंने इस पृथ्वी पर फिर जन्म लिया या नहीं।

 

यदि वे कहीं है और मेरी बात को सुन सकते है तो मैं उनसे कहना चाहता हूं___”हे चाणक्य ! सूर्य के फैले हुए प्रकाश की तरह तुम्हारा यश आज भी इस देश के कोने-कोने में फैला है। आज भी लगभग वैसी ही परिस्थितियां है जो तुम्हारे युग में हुआ करती थी। आज भी हमे तुम्हारी सख्त आवश्यकता है।

 

आज देश के चाणक्य कुटिया छोड़कर महलों में रहने लगे है। लाखों-करोड़ो चंद्रगुप्तो का जीवन बर्बाद हो रहा है। ऐसे में तुम ही देश को एक नई दिशा दे सकते हो। तुम ही राजनीति को लाभ की वस्तु न समझ, राजनीति के माध्यम से देश की सेवा कर सकते हो।

 

यदि तुम कहीं हो तो सामने आओ। नहीं हो तो पुनः जन्म लो। तुम्हे हमारे बीच आना ही होगा। इस देश को अन्याय, अत्याचार, गरीबी, बेरोजगारी, लूटपाट व् रक्तपात से बचाना ही होगा। अपने देश की स्वतंत्रता को मूल्यविहीन होने से रोकना ही होगा। हम सभी तुम्हारा आह्वान करते है चाणक्य। तुम एक दृढ़-संकल्प लेकर फिर लौट आओ। हम तुम्हारी व्याकुलता से प्रतीक्षा कर रहे है ! लौट आओ चाणक्य ! लौट आओ !”

 

चाणक्य – सम्पूर्ण कहानी भाग – 9

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